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सुन्दरकांड की वो चौपाई जिसे विवादित माना गया, जाने वास्तविकता में तुलसीदास जी कहना क्या चाहते हैं

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रामचरितमानस के सुंदरकांड की यह चौपाई संभवतः सबसे अधिक विवादित और गलत समझी जाने वाली पंक्तियों में से एक है। इसे सही ढंग से समझने के लिए प्रसंग (Context), पात्र और शब्दों के अवधी अर्थ को जानना बहुत जरूरी है।

चौपाई है:

                                               “ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥”

यहाँ इस चौपाई का गहन विश्लेषण और वास्तविक अर्थ दिया गया है:

1. प्रसंग (किसने, किससे कहा?)

यह बात न तो भगवान राम ने कही है और न ही तुलसीदास जी ने अपने विचार के रूप में लिखी है। यह संवाद समुद्र का है। जब भगवान राम ने समुद्र सुखाने के लिए धनुष उठाया, तब समुद्र डरकर बाहर आया और अपनी जड़ता (मूर्खता) स्वीकार करते हुए राम जी से माफी मांगते हुए यह बात कही।

2. ‘ताड़ना’ शब्द का असली अर्थ

इस पूरी चौपाई का विवाद ‘ताड़ना’ शब्द पर टिका है। आधुनिक हिंदी में ‘ताड़ना’ का अर्थ ‘पीटना’ या ‘प्रताड़ित करना’ निकाल लिया जाता है, लेकिन तुलसीदास जी की अवधी में इसके अर्थ अलग थे:
* ताड़ना का वास्तविक अर्थ: देखना, परखना, ध्यान रखना, मर्यादा में रखना या शिक्षा देना।
* तुलसीदास जी ने ही अन्य जगह लिखा है— “बिहँसि ताड़ि गोसाँई” (यहाँ ताड़ने का अर्थ है भांप लेना या गहराई से देख लेना)।

3. पाँचों पात्रों के संदर्भ में अर्थ

इस चौपाई में पाँच चीज़ों का ज़िक्र है, और हर एक के लिए ‘ताड़ना’ का अर्थ उसकी प्रकृति के हिसाब से बदल जाता है:

   

पात्र             ताड़ना’ का सही अर्थ                                              व्याख्या

ढोल         सुर मिलाना / परखना        ढोल को पीटा नहीं जाता, बल्कि उसे ‘ट्यून’ किया जाता है। अगर उसकी रस्सी ढीली हो या        खिंचाव सही न हो, तो वह सुरीला नहीं बजेगा। उसे ध्यान से ‘देखना’ पड़ता है।

गवाँर       नजर रखना            जो व्यक्ति अज्ञानी या विवेकहीन (गवाँर) है, उसे अकेला छोड़ने पर वह खुद का या दूसरो का नुकसान कर सकता है। उस पर मार्गदर्शन के लिए ‘नज़र’ रखना ज़रूरी है।

सूद्र         शिक्षा/अनुशासन               यहाँ ‘सूद्र’ का अर्थ जाति से नहीं, बल्कि ‘शिल्पकार’ या ‘सेवक’ से है। किसी भी कार्य करने वाले को अगर सही निर्देश (Instruction) न दिए जाएं, तो काम बिगड़ सकता है।

पशु          नियंत्रण                        यदि पशु (जैसे गाय या घोड़ा) पर ध्यान न दिया जाए, तो वह खेत चर सकता है या रास्ता                 भटक सकता है। उसे ‘मर्यादा’ और ‘देखभाल’ की ज़रूरत होती है

नारी         सुरक्षा/सम्मान                उस काल के सामाजिक परिवेश में, समुद्र कह रहा है कि स्त्री को विशेष ‘देखभाल’ और                 ‘सुरक्षा'(Protection) की आवश्यकता होती है। इसे आज के ‘पीटने’ के अर्थ में लेनातरह गलत है।

4. विद्वानों का मत

जगतगुरु रामभद्राचार्य जैसे महान विद्वान और कई अन्य रामायणी स्पष्ट करते हैं कि तुलसीदास जी जैसा संवेदनशील कवि, जिसने ‘नारी’ के सम्मान में अनेकों पद लिखे हों, वह उसे पीटने की बात कभी नहीं कर सकता।
समुद्र यहाँ कह रहा है कि— “प्रभु, मेरी प्रकृति जड़ है। जैसे इन पाँचों को विशेष ‘ध्यान और अनुशासन’ की ज़रूरत होती है, वैसे ही मैं भी आपकी शिक्षा (ताड़ना) का पात्र था।”

निष्कर्ष:
यह चौपाई प्रताड़ना का नहीं, बल्कि ‘विशेष ध्यान देने’ (Observation and Care) का संदेश देती है। तुलसीदास जी के साहित्य में ‘नारी’ को हमेशा उच्च स्थान दिया गया है, इसलिए इसे हिंसा के समर्थन में देखना अर्थ का अनर्थ करना है।

यह पूरा लेख AI की सहायता से लिखा है इस लिए पाठक अपने विवेक का प्रयोग करें।

IKV News
Author: IKV News

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