हमीरपुर/कुरारा : महाशिवरात्रि का पर्व केवल श्रद्धा ही नहीं, बल्कि अनुशासन का भी प्रतीक है। अक्सर भक्त अनजाने में पूजन में कुछ ऐसी गलतियां कर देते हैं जो शास्त्रों में वर्जित हैं। ‘IKV News’ की इस विशेष रिपोर्ट में आज हम जानेंगे भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने की सही वैदिक विधि और नियम।
वैदिक पूजन की सरल विधि (स्टेप-बाय-स्टेप)
संकल्प: प्रातः काल स्नान के बाद हाथ में जल और अक्षत लेकर व्रत का संकल्प लें। “शिवरात्रि व्रत” का अर्थ केवल निराहार रहना नहीं, बल्कि मन को शिव में लीन करना है।
पञ्चामृत स्नान: शिवलिंग पर सबसे पहले जल, फिर दूध, दही, घी, शहद और अंत में शक्कर चढ़ाएं। अंत में शुद्ध गंगाजल से अभिषेक करें।
अष्टगंध और भस्म: भगवान शिव को चंदन या अष्टगंध का तिलक लगाएं। यदि संभव हो तो भस्म अर्पित करें, यह शिव को अत्यंत प्रिय है।
बिल्वपत्र का नियम: बिल्वपत्र चढ़ाते समय ध्यान रखें कि उसका चिकना हिस्सा शिवलिंग की ओर हो। बिना कटे-फटे तीन पत्तों वाला दल ही चढ़ाएं।
चार प्रहर की पूजा: यदि संभव हो, तो शिवरात्रि की रात के चारों प्रहर में पूजा करें। हर प्रहर में अलग-अलग द्रव्यों (दूध, दही, घी, शहद) से अभिषेक का विशेष फल मिलता है।
क्या करें? (पते की बातें)
मौन या जप: पूजा के दौरान जितना संभव हो मौन रहें या ‘ॐ नमः शिवाय’ का मानसिक जप करते रहें।
जागरण: रात के समय सोएं नहीं। शिवरात्रि की रात ब्रह्मांडीय ऊर्जा चरम पर होती है, इसलिए रीढ़ की हड्डी सीधी रखकर बैठना या भजन करना श्रेष्ठ है।
दान: इस दिन सफेद वस्तुओं (चावल, दूध, चीनी) का दान करना विशेष फलदायी माना गया है।
भूलकर भी न करें ये काम (क्या न करें?)
केतकी का फूल: शास्त्रों के अनुसार, केतकी के फूल को भगवान शिव ने शापित किया था, इसलिए इसे कभी भी शिवलिंग पर अर्पित न करें।
तुलसी दल: भगवान शिव की पूजा में तुलसी का प्रयोग वर्जित है। इसकी जगह बेलपत्र या शमी के पत्तों का उपयोग करें।
सिंदूर और हल्दी: शिवलिंग पुरुष तत्व का प्रतीक है, इसलिए इस पर सिंदूर या हल्दी नहीं चढ़ानी चाहिए। केवल चंदन का ही प्रयोग करें।
नारियल पानी: भगवान शिव पर नारियल चढ़ाया जा सकता है, लेकिन नारियल के पानी से अभिषेक करना वर्जित माना गया है।
तांबे के लोटे में दूध: अभिषेक के लिए तांबे के पात्र का उपयोग अच्छा है, लेकिन तांबे के लोटे में दूध डालकर अर्पित न करें। दूध के लिए पीतल या चांदी के पात्र का प्रयोग करें (तांबे में दूध विष के समान हो जाता है)।
पूर्ण परिक्रमा: शिवलिंग की कभी भी पूरी परिक्रमा न करें। जहाँ से अभिषेक का जल बाहर निकलता है (सोमसूत्र), उसे लांघना नहीं चाहिए। हमेशा आधी परिक्रमा (चंद्राकार) ही करें।
भगवान शिव भाव के भूखे हैं। यदि आपके पास सामग्री कम भी है, तो केवल ‘एक लोटा जल’ और ‘सच्चा विश्वास’ भी उन्हें प्रसन्न करने के लिए पर्याप्त है।







