रेल के एसी कोचों से 1.27 करोड़ बेडरोल गायब: चोर कोई शातिर गिरोह नहीं, हम-आप जैसे यात्री!

SHARE:

राम मंदिर के दान पर नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले समाज के लिए आईना

सुशील कुमार | विशेष रिपोर्ट | इंडिया खोज विचार

देश में जब भी किसी मंदिर, ट्रस्ट या सरकारी धन में चोरी की खबर आती है, सोशल मीडिया पर नैतिकता का सैलाब उमड़ पड़ता है। अयोध्या के श्रीराम मंदिर में दान चोरी की खबर पर करोड़ों लोगों ने आक्रोश जताया। लेकिन क्या हमने कभी अपने भीतर झांका?

आज जो तथ्य सामने आए हैं, वे समाज के मुंह पर करारा तमाचा हैं।

सूचना के अधिकार (RTI) के जरिए सामने आए आंकड़ों के अनुसार जनवरी 2022 से मई 2026 के बीच भारतीय रेलवे के एसी कोचों से 1.27 करोड़ से अधिक बेडरोल (Bedsheets, Towels, Blankets, Pillows, Pillow Covers) गायब हो चुके हैं। इनकी अनुमानित कीमत 104.51 करोड़ रुपये से अधिक है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि रेलवे अधिकारियों के अनुसार ये सामान किसी संगठित चोर गिरोह ने नहीं, बल्कि अधिकांश मामलों में एसी कोचों में यात्रा करने वाले यात्रियों द्वारा ले जाए गए।


चोरी का पूरा हिसाब

विवरण आंकड़े
अवधि              जनवरी 2022 – मई 2026
गायब बेडरोल सामग्री             1.27 करोड़ से अधिक
अनुमानित आर्थिक नुकसान             ₹104.51 करोड़
चोरी में वृद्धि              2022 से 2025 के बीच 56% बढ़ोतरी
प्रतिदिन एसी यात्रियों को उपलब्ध कराए जाने वाले बेडरोल लगभग    8 लाख यात्रियों को

आखिर क्या-क्या गायब हुआ?

रेलवे के एसी कोचों में यात्रियों को सामान्यतः मिलता है—

  • 2 बेडशीट
  • 1 कंबल
  • 1 तकिया
  • 1 तकिया कवर
  • 1 फेस टॉवल

यही सामग्री सबसे अधिक चोरी हुई। RTI जांच में विभिन्न रेलवे मंडलों ने अलग-अलग श्रेणियों में लाखों की संख्या में इन वस्तुओं के गायब होने की जानकारी दी।


यह चोरी कौन करता है?

यहां सबसे बड़ा प्रश्न यही है।

कई लोग तुरंत कह देंगे  —   “कोई जरूरतमंद ले गया होगा।”    लेकिन यह तर्क तथ्यों के सामने टिकता नहीं।

बेडरोल केवल AC First, AC-2, AC-3 और कुछ प्रीमियम ट्रेनों में उपलब्ध कराया जाता है।

यानी—

  • जिसने हजारों रुपये खर्च कर एसी टिकट खरीदी,
  • जो आरक्षित सीट पर यात्रा कर रहा था,
  • जिसे यात्रा की सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं,

उसी वर्ग के कुछ लोग रेलवे का तौलिया, चादर, तकिया या कंबल अपने बैग में डालकर घर ले गए।

गरीब, सामान्य या बिना टिकट यात्री को यह सुविधा मिलती ही नहीं।

इसलिए “जरूरतमंद” वाला तर्क वास्तविकता से मेल नहीं खाता। उपलब्ध जांच और रेलवे अधिकारियों के बयानों में भी चोरी का मुख्य संदेह यात्रियों पर ही जताया गया है।


सबसे दुखद पहलू

इस चोरी का नुकसान हमेशा सीधे रेलवे नहीं उठाती।

कई मार्गों पर लिनेन वितरण का काम ठेके पर होता है। यदि बेडशीट, तौलिया या अन्य सामग्री कम मिलती है तो उसकी कीमत कई बार संबंधित ठेकेदार या कर्मचारियों के भुगतान से वसूल की जाती है।

यानी—

जिस कर्मचारी की मासिक आय सीमित है,  उसे किसी यात्री की बेईमानी की कीमत चुकानी पड़ती है।


यह कोई नई समस्या नहीं

रेलवे वर्षों से इस समस्या से जूझ रहा है।

2018 में भी रेलवे ने बताया था कि केवल एक वर्ष में लगभग—

  • 1.95 लाख तौलिये
  • 81,736 बेडशीट
  • 55,573 पिलो कवर
  • 7,043 कंबल

गायब हो गए थे।

सिर्फ अप्रैल से सितंबर 2018 के बीच ही 62 लाख रुपये मूल्य का लिनेन चोरी हुआ था।


अब रेलवे क्या कर रही है?

रेल मंत्रालय ने बढ़ती चोरी को देखते हुए—

  • निगरानी बढ़ाने,
  • जवाबदेही तय करने,
  • तकनीकी निगरानी,
  • लिनेन प्रबंधन को और सख्त बनाने

जैसे कदम शुरू किए हैं।


समाज के लिए आईना

हम अक्सर कहते हैं—

  • सरकार कुछ नहीं करती।
  • रेलवे साफ नहीं है।
  • सुविधाएं घटिया हैं।
  • टैक्स का पैसा बर्बाद हो रहा है।

लेकिन जब वही सरकारी संपत्ति हमारे सामने होती है—

  • कोई तौलिया बैग में रख लेता है,
  • कोई चादर “यादगार” बना लेता है,
  • कोई तकिया कवर घर ले जाता है।

फिर वही लोग सोशल मीडिया पर सरकारी व्यवस्था को कोसते दिखाई देते हैं।

सरकारी संपत्ति किसी सरकार की नहीं होती, देश की होती है।


संपादकीय टिप्पणी

राम मंदिर में दान चोरी की घटना पर देश ने नैतिकता की बात की, और करनी भी चाहिए। लेकिन यदि वही समाज रेलवे की चादर, तौलिया या कंबल चुराने को “चलता है” मान ले, तो यह दोहरा मापदंड है।

ईमानदारी का पैमाना केवल बड़े अपराध नहीं होते; छोटी बेईमानियां ही बड़े भ्रष्टाचार की नींव बनती हैं।

सरकारी संपत्ति की चोरी चाहे एक रुपये की हो या सौ करोड़ की—वह अंततः जनता की ही संपत्ति की चोरी है।

IKV News
Author: IKV News