बड़ी माता मंदिर में सुबह से ही पूजा-अर्चना के लिए जुट रहीं महिलाएं; नौ दिनों तक देवी के विभिन्न स्वरूपों की आराधना और कन्या पूजन का रहेगा विशेष महत्व
कुरारा, हमीरपुर। शारदीय नवरात्र के पावन पर्व की शुरुआत होते ही पूरे देश में मां दुर्गा की आराधना का वातावरण बन गया है। मंदिरों से लेकर घरों तक भक्तिमय माहौल है। पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा की भव्यता विश्वविख्यात है, वहीं उत्तर प्रदेश के छोटे-छोटे कस्बों में भी मां आदिशक्ति के प्रति श्रद्धा और आस्था की गहरी परंपरा देखने को मिलती है। हमीरपुर जनपद के कुरारा कस्बे में भी नवरात्र को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह है। कस्बे के देवी मंदिरों में सुबह से ही पूजा-अर्चना के लिए भक्तों की भीड़ उमड़ रही है।
कुरारा जैसे छोटे कस्बे में मां दुर्गा के प्रति अटूट आस्था का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां नवरात्र के दौरान 12 से अधिक पूजा पंडाल सजाए जाते हैं। इन पंडालों में मां दुर्गा की प्रतिमाओं की स्थापना कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। नौ दिनों तक भजन, देवी गीत और आरती से वातावरण भक्तिमय बना रहता है। श्रद्धालु परिवार सहित मां के दर्शन करने पहुंचते हैं और सुख, शांति, समृद्धि तथा परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं।
बड़ी माता मंदिर की छटा रहती है निराली
कुरारा के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल बड़ी माता मंदिर में नवरात्र के दौरान विशेष रौनक देखने को मिलती है। यहां भोर होते ही महिलाओं और युवतियों सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु पूजा-अर्चना के लिए पहुंचने लगते हैं। मंदिर परिसर में मां के दर्शन, दीप प्रज्ज्वलन, चुनरी अर्पण और आरती के माध्यम से भक्त अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं।
नवरात्र के नौ दिनों में मंदिर में छोटी-छोटी बच्चियों को मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों के रूप में सजाने की परंपरा विशेष आकर्षण का केंद्र रहती है। सुसज्जित बच्चियों का मनोहारी स्वरूप श्रद्धालुओं को देवी के मातृशक्ति रूप का स्मरण कराता है। मंदिर में उमड़ने वाली भीड़ और भक्ति से सराबोर वातावरण कुरारा की धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपरा को जीवंत बनाता है।
क्या है नवरात्र का वास्तविक अर्थ?
‘नवरात्र’ दो शब्दों से मिलकर बना है—’नव’ अर्थात नौ और ‘रात्रि’ अर्थात रात। सनातन परंपरा में ये नौ रातें मां दुर्गा और उनकी नौ शक्तियों की उपासना के लिए समर्पित मानी जाती हैं। देवी के नौ स्वरूपों को नवदुर्गा कहा जाता है। इनमें शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री शामिल हैं।
नवरात्र केवल धार्मिक अनुष्ठान का पर्व नहीं, बल्कि आत्मसंयम, साधना, सकारात्मकता और नारी शक्ति के सम्मान का भी संदेश देता है। मां दुर्गा की उपासना बुराई पर अच्छाई, अन्याय पर न्याय और अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक मानी जाती है। भक्त इन नौ दिनों में अपने मन, विचार और आचरण को शुद्ध रखने तथा सेवा, दया और सदाचार अपनाने का संकल्प लेते हैं।
वर्ष में कितनी बार आते हैं नवरात्र?
हिंदू पंचांग के अनुसार वर्ष में चार प्रमुख नवरात्र मनाए जाते हैं। इनमें दो व्यापक रूप से प्रसिद्ध हैं और दो गुप्त नवरात्र कहलाते हैं।
1. चैत्र नवरात्र: चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से आरंभ होते हैं। इनका समापन रामनवमी के आसपास होता है। इसी अवधि में हिंदू नववर्ष की शुरुआत भी मानी जाती है।
2. शारदीय नवरात्र: आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से प्रारंभ होते हैं। नौ दिनों तक मां दुर्गा की पूजा के बाद दशमी को विजयादशमी या दशहरा मनाया जाता है। देश के अनेक हिस्सों में दुर्गा पूजा का भव्य आयोजन इसी समय होता है।
3. माघ गुप्त नवरात्र: माघ मास के शुक्ल पक्ष में मनाए जाते हैं। इनका विशेष महत्व साधना और तांत्रिक परंपराओं में माना जाता है।
4. आषाढ़ गुप्त नवरात्र: आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष में आते हैं। इस अवधि में विशेष साधना, मंत्र-जप और देवी उपासना की परंपरा है।
चैत्र और शारदीय नवरात्र आम श्रद्धालुओं के बीच विशेष रूप से लोकप्रिय हैं, जबकि गुप्त नवरात्र मुख्यतः साधना और आध्यात्मिक अनुष्ठानों से जुड़े माने जाते हैं।
नवरात्र में पूजा-अर्चना की सरल और पारंपरिक विधि
नवरात्र में मां दुर्गा की पूजा श्रद्धा, स्वच्छता और सात्त्विक भाव से की जाती है। सामान्य गृहस्थ श्रद्धालु भी सरल विधि से पूजा कर सकते हैं।
प्रथम दिन घटस्थापना: प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थल को साफ करें। शुभ मुहूर्त में मिट्टी के पात्र में जौ बोकर उसके समीप जल से भरा कलश स्थापित किया जाता है। कलश स्थापना की विधि परिवार की परंपरा और मान्यताओं के अनुसार की जा सकती है। शुभ मुहूर्त के लिए स्थानीय पंचांग देखना उचित है।
दैनिक पूजन: मां दुर्गा के समक्ष दीपक जलाएं। पुष्प, अक्षत, रोली, धूप और उपलब्ध मौसमी फल अर्पित करें। श्रद्धानुसार दुर्गा चालीसा, दुर्गा सप्तशती के पाठ अथवा ‘ॐ दुं दुर्गायै नमः’ मंत्र का जप करें। इसके बाद मां की आरती कर परिवार और समाज के कल्याण की प्रार्थना करें।
व्रत और सात्त्विक आहार: व्रत रखना व्यक्तिगत श्रद्धा और सामर्थ्य पर निर्भर है। फलाहार या सात्त्विक भोजन ग्रहण किया जा सकता है। व्रत के दौरान अपनी शारीरिक क्षमता का ध्यान रखना चाहिए।
अष्टमी या नवमी पर कन्या पूजन: परंपरा के अनुसार छोटी कन्याओं को देवी स्वरूप मानकर उनका सम्मान किया जाता है। उन्हें स्वच्छता और आदर के साथ भोजन कराया जाता है तथा सामर्थ्य के अनुसार उपहार या दक्षिणा दी जाती है। कन्या पूजन में दिखावे के बजाय श्रद्धा, सम्मान और सेवा का भाव महत्वपूर्ण है।
दशमी पर समापन: नवरात्र के बाद विजयादशमी मनाई जाती है। घटस्थापना और जौ विसर्जन सहित समापन की प्रक्रिया परिवार की परंपरा और स्थानीय रीति के अनुसार की जाती है।
नवरात्र के अनुष्ठानों में किसी प्रकार की बाध्यता नहीं है। श्रद्धालु अपनी आस्था, सुविधा और पारिवारिक परंपरा के अनुरूप पूजा कर सकते हैं।
आस्था के साथ सामाजिक एकता का संदेश
कुरारा में नवरात्र का उत्सव केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह सामाजिक मेलजोल, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सामूहिक सहभागिता का अवसर भी बनता है। पूजा पंडालों में श्रद्धालुओं की भागीदारी और मंदिरों में उमड़ती भीड़ कस्बे की धार्मिक चेतना को दर्शाती है।
मां दुर्गा की आराधना के इस पावन अवसर पर स्वच्छता बनाए रखना, पूजा स्थलों पर अनुशासन का पालन करना, महिलाओं और बच्चियों का सम्मान करना तथा जरूरतमंदों की सहायता करना पर्व की भावना को और सार्थक बना सकता है।
शारदीय नवरात्र का संदेश यही है कि शक्ति की उपासना के साथ सत्य, करुणा, साहस और सदाचार को भी जीवन में स्थान दिया जाए। कुरारा में मां आदिशक्ति के जयकारों के बीच शुरू हुआ यह पर्व श्रद्धालुओं के लिए भक्ति, विश्वास और नई ऊर्जा का अवसर लेकर आया है।
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