अजय कुमार,
वरिष्ठ पत्रकार
लखनऊ ( उ. प्र.)
भारतीय राजनीति में क्या जेन जी के बीच एक ऐसा वैचारिक और सामाजिक बदलाव आकार ले रहा है, जिसे पारंपरिक राजनीतिक चश्मे से देखना अब संभव नहीं रह गया है। हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत द्वारा एक समाचार चैनल को दिए गए साक्षात्कार ने इस बात पर मुहर लगा दी है कि देश का वैचारिक नेतृत्व अब युवा वर्ग, विशेषकर जेन जी यानी इंटरनेट युग में पैदा हुई और पली-बढ़ी पीढ़ी को लेकर बेहद गंभीर है। स्वतंत्रता दिवस के तुरंत बाद संघ के प्रचारकों द्वारा देश के अलग-अलग हिस्सों में जाकर जेन जी के साथ सीधे संवाद स्थापित करने की योजना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि संघ अपनी पारंपरिक कार्यशैली से बाहर निकलकर इस डिजिटल पीढ़ी की नब्ज टटोलने की कोशिश कर रहा है। यह पीढ़ी किसी भी व्यवस्था को आंख मूंदकर स्वीकार करने के बजाय उसे तर्क, पारदर्शिता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की कसौटी पर परखती है। ऐसे में संघ का यह कदम केवल एक सामान्य जनसंपर्क अभियान नहीं है, बल्कि भारत के सबसे बड़े वैचारिक संगठन द्वारा भविष्य की वैचारिक जमीन को बचाने और बुनने की एक सुनियोजित रणनीति है।
आज के दौर में जेन जी की सोच को समझना इसलिए भी चुनौतीपूर्ण और आवश्यक हो गया है क्योंकि यह पीढ़ी सोशल मीडिया के एल्गोरिदम, वैश्विक सूचना प्रवाह और त्वरित संवाद के माहौल में बड़ी हुई है। इनके लिए राजनीतिक निष्ठाएं पारंपरिक या आनुवंशिक नहीं हैं, बल्कि ये मुद्दों, शासन की गुणवत्ता, रोजगार के अवसरों, व्यक्तिगत अधिकारों और सामाजिक न्याय के पैमानों पर सरकारों का मूल्यांकन करती हैं। संघ और उससे जुड़े वैचारिक संगठनों को यह अहसास हो चला है कि यदि इस पीढ़ी की आकांक्षाओं, असहजताओं और सवालों को समय रहते नहीं समझा गया, तो वैचारिक मोर्चे पर एक बड़ी खाई पैदा हो सकती है। पुरानी व्यवस्थाओं और धार्मिक-सामाजिक मान्यताओं को तार्किक कसौटी पर कसने की इस प्रवृत्ति ने राजनीतिक दलों के पारंपरिक सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूलों को भी चुनौती दी है। जब संघ के प्रचारक देश के युवाओं के बीच जाएंगे, तो उनका मुख्य उद्देश्य यह जानना होगा कि केंद्र और राज्य सरकारों की नीतियों, आर्थिक प्राथमिकताओं और शासन प्रणाली को लेकर इस वर्ग के मन में क्या कसैलापन या असंतोष है। इस संवाद से मिलने वाला फीडबैक केवल संघ के सांगठनिक विस्तार का आधार नहीं बनेगा, बल्कि यह आने वाले समय में देश की सामाजिक और युवा रणनीति को नए सिरे से आकार देने का मुख्य दस्तावेज भी साबित होगा।
इस पूरी कवायद में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की भूमिका और उसकी राजनीतिक कार्यप्रणाली भी केंद्र में है। पिछले एक दशक से अधिक समय से केंद्र की सत्ता पर काबिज और राष्ट्रवाद के एजेंडे पर मुखर रहने वाली बीजेपी के लिए युवा वर्ग का समर्थन उसकी चुनावी सफलताओं की रीढ़ रहा है। हालांकि, जैसे-जैसे जेन जी मतदाता सूची में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा रहा है, वैसे-वैसे उसकी प्राथमिकताएं बदल रही हैं। यह पीढ़ी नारों और भावनात्मक बहसों से ज्यादा सुशासन, डिजिटल अर्थव्यवस्था, पर्यावरण, पारदर्शिता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और करिअर की अनिश्चितताओं जैसे मुद्दों पर बात करना चाहती है। ऐसे में यह सवाल बेहद प्रासंगिक हो जाता है कि क्या संघ के इस सीधे संवाद कार्यक्रम के दौरान भारतीय जनता पार्टी को भी कोई वैचारिक या नीतिगत नसीहत दी जा सकती है? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संघ का यह कदम अप्रत्यक्ष रूप से बीजेपी के लिए एक आत्ममंथन का संदेश भी हो सकता है। संघ हमेशा से सरकार और समाज के बीच एक सेतु की तरह काम करता रहा है। यदि जमीनी संवाद के दौरान युवाओं की ओर से शासन की कार्यशैली, नौकरशाही की लालफीताशाही, रोजगार के संकट या वैचारिक असहिष्णुता को लेकर कोई तीखी प्रतिक्रिया सामने आती है, तो संघ उसे पूरी गंभीरता से सत्ता के शीर्ष तक पहुंचाएगा।
संघ की जेन जी को लेकर दूरगामी रणनीति केवल राजनीतिक लाभ हासिल करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैचारिक निरंतरता बनाए रखने की एक लंबी लड़ाई है। किसी भी संगठन के लिए यह स्वीकार करना सबसे कठिन होता है कि उसकी पुरानी वैचारिक भाषा नई पीढ़ी तक प्रभावी ढंग से नहीं पहुंच पा रही है। संघ यह भली-भांति समझता है कि यदि आज के युवाओं से संवाद का सिलसिला नहीं जोड़ा गया, तो आने वाले दशकों में वैचारिक शून्यता पैदा हो सकती है, जिसका नुकसान राष्ट्रवाद के पूरे विमर्श को उठाना पड़ सकता है। इसलिए, यह संवाद कार्यक्रम इस बात की ताकीद करता है कि वैचारिक संगठनों को भी अपने तौर-तरीकों में लचीलापन लाना होगा। वे युवाओं को उपदेश देने के बजाय उनकी बात सुनने की मुद्रा में आ रहे हैं, जो एक बड़ा वैचारिक बदलाव है। इसके जरिए संघ अपनी छवि को केवल एक अनुशासित और पारंपरिक संगठन के रूप में पेश करने के बजाय एक ऐसी जीवंत संस्था के रूप में स्थापित करना चाहता है जो समकालीन समय की हर जटिलता और युवा वर्ग की हर बेचैनी को समझने का माद्दा रखती है।
कुल मिलाकर जेन जी के साथ संघ का यह सीधा संवाद भारतीय लोकतंत्र और राजनीति दोनों के लिए एक नए अध्याय की शुरुआत साबित हो सकता है। यदि संघ अपने प्रचारकों के माध्यम से युवाओं के वास्तविक फीडबैक को स्वीकार करने और उस पर अमल करने में सफल होता है, तो इससे न केवल समाज में वैचारिक ध्रुवीकरण की तीक्ष्णता कम होगी, बल्कि शासन व्यवस्था में सुधार के लिए नए रास्ते भी खुलेंगे। वहीं दूसरी ओर, यदि इस संवाद के आधार पर बीजेपी को अपनी नीतियों और संवाद शैली में बदलाव करने की कोई सलाह मिलती है, तो वह देश की मुख्यधारा की राजनीति को और अधिक उत्तरदायी और युवा-केंद्रित बना सकती है। यह देखना दिलचस्प होगा कि जब देश का सबसे पुराना और प्रभावशाली वैचारिक संगठन इंटरनेट की इस बेबाक पीढ़ी के सामने खुले मंच पर अपनी बात रखेगा और उनकी सुनेगा, तो भारतीय राजनीति का भविष्य किस करवट बैठेगा। साफ है कि आने वाले दिनों में युवा मन की थाह लेने की यह कोशिश देश के राजनीतिक और वैचारिक गलियारों में गहरे बदलावों की इबारत लिखने वाली है।
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