जिले की पहचान ‘गौरा पत्थर’ की मूर्ति कला दम तोड़ती नजर आई, कारीगर पलायन को मजबूर

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(नितेन्द्र झां)

#महोबा बुंदेलखंड की शान और महोबा की पहचान मानी जाने वाली ‘गौरा पत्थर’ की मूर्ति कला अब अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। चंदेलकालीन परंपरा को संजोने वाले शिल्पकारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। पीढ़ियों से चली आ रही यह कला धीरे-धीरे दम तोड़ती नजर आ रही है।

महोबा के गौरहारी पहाड़ों से निकलने वाला ‘गौरा पत्थर’ बेहद मुलायम, सफेद-गुलाबी आभा लिए होता था। इस पर की गई बारीक नक्काशी सदियों तक खराब नहीं होती। चंदेलकालीन मंदिरों से लेकर आधुनिक घरों तक में गौरा पत्थर से बनी गणेश-लक्ष्मी, बुद्ध, और बुंदेली लोक-देवताओं की मूर्तियों की मांग रहती थी। खास बात ये कि बिना जोड़ के एक ही पत्थर से पूरी मूर्ति तराशी जाती थी।

कारीगरों का दर्द:-
जिले के थाना चरखारी अंतर्गत गौरहारी में 40 से ज्यादा परिवार इस काम से जुड़े थे, अब सिर्फ 7-8 परिवार बचे हैं। 45 वर्षीय शिल्पकार भोला बताते हैं – “पहले एक फुट की मूर्ति 15 दिन में बनाकर 3000-4000 रुपये मिल जाते थे। अब POP और फाइबर की सस्ती मूर्तियों ने बाजार मार लिया। गौरा पत्थर महंगा पड़ता है, ग्राहक मोलभाव करके 800-1000 में मांगते हैं। बिजली, औजार, पत्थर का खर्च निकालकर मजदूरी भी नहीं बचती।”

नई पीढ़ी इस काम से विमुख हो रही है। कारीगरों के बच्चे अब दिल्ली, सूरत में मजदूरी करने जा रहे हैं। 22 साल के दीपक कहते हैं – “महीने में 4-5 हजार कमाने से अच्छा है फैक्ट्री में 12 हजार मिल जाएं। हुनर से पेट नहीं भरता।”

कच्चे माल की कमी – वन विभाग की रोक और लीज न मिलने से गौरा पत्थर का खनन लगभग बंद है। कारीगरों को मध्यप्रदेश से 3 गुना दाम पर पत्थर खरीदना पड़ता है।


बाजार न मिलना- सरकारी प्रदर्शनी, मेला, ODOP योजना में गौरा पत्थर को वो जगह नहीं मिली जो बनारस की लकड़ी या सहारनपुर के वुडवर्क को मिली।
प्रशिक्षण का अभाव- शिल्प कला सिखाने के लिए कोई संस्थान नहीं। पुराने उस्तादों के साथ ही हुनर खत्म हो रहा है।


आधुनिकता की मार- लोग रेडीमेड, हल्की और सस्ती POP की मूर्तियां पसंद करते हैं। गौरा पत्थर भारी और महंगा लगता है।

जिला उद्योग केंद्र के उपायुक्त ने बताया ODOP में गौरा पत्थर शामिल है। हम शिल्पकारों को टूलकिट और 15 हजार तक की सहायता दे रहे हैं। जल्द ही लखनऊ और दिल्ली के क्राफ्ट मेलों में स्टॉल दिलवाएंगे।

स्थानीय लोगों का मानना है कि अगर गौरा पत्थर को GI टैग मिल जाए, ई-कॉमर्स से जोड़ा जाए और पर्यटन स्थलों पर बिक्री केंद्र बनें तो कला बच सकती है। ये सिर्फ मूर्ति नहीं, बुंदेलखंड की 1000 साल पुरानी विरासत है।

फिलहाल हालात ये हैं कि जिन हाथों ने पत्थर को भगवान का रूप दिया, वही हाथ आज खाली हैं। अगर समय रहते ठोस कदम न उठे तो महोबा की ये अनूठी पहचान सिर्फ किताबों में रह जाएगी।

Nitendra Jha
Author: Nitendra Jha

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